दून में अब पालतू जानवरों के नाम पर चल रहा ब्रीडिंग और बिक्री का एक ऐसा बाजार खड़ा हो गया है, जो न केवल नियम-कायदों को ठेंगा दिखा रहा है, बल्कि आम नागरिकों के जीवन को भी खतरे में डाल रहा है।
खूंखार और प्रतिबंधित नस्लों के कुत्तों की खुलेआम खरीद-फरोख्त हो रही है, जिनकी ब्रीडिंग भी शहर में ही हो रही है, बिना किसी सरकारी निगरानी और अनुमति के। दून में बड़ी संख्या में पेट शाप और डाग ब्रीडिंग सेंटर स्थित हैं, जिनकी निगरानी तक नहीं हो रही है। साथ ही अवैध रूप से घरों या आनलाइन माध्यम से भी यह काला कारोबार किया जा रहा है।
उत्तराखंड में 50 पेट शॉप और 22 डाग ब्रीडर एनिमल वेल्फेयर बोर्ड में पंजीकृत हैं। देहरादून की बात करें तो यहां 34 पेट शाप और 19 डाग ब्रीडर रजिस्टर्ड हैं। लेकिन, यह संख्या असल बाजार की हकीकत नहीं दिखाती, क्योंकि दर्जनों आनलाइन प्लेटफार्म और व्हाट्सएप ग्रुप्स के ज़रिए अवैध रूप से कुत्तों की बिक्री और ब्रीडिंग हो रही है।
इनका नगर निगम में कोई पंजीकरण नहीं है, न ही इन पर कभी कोई छापेमारी होती है। राटवीलर, पिटबुल, टोसा इनू, डोगो अर्जेंटीनो, अमेरिकन बुली जैसी नस्लें जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खतरनाक घोषित हो चुकी हैं देहरादून की गलियों और मोहल्लों में खुलेआम पाली जा रही हैं। ये कुत्ते या तो दिल्ली-एनसीआर से लाए जाते हैं या शहर में ही ब्रीड किए जा रहे हैं।
ब्रीडिंग का यह गुप्त कारोबार न तो लाइसेंस के दायरे में है और न ही कोई मेडिकल वैरिफिकेशन या वेलफेयर मानकों का पालन करता है। कुत्तों की बिक्री के लिए पेट शाप को एनिमल वेल्फेयर बोर्ड से लाइसेंस लेना होता है। साथ ही नगर निगम में भी पंजीकरण अनिवार्य है, लेकिन ग्राउंड पर यह प्रक्रिया महज कागजों तक सीमित है। देहरादून में अधिकांश डीलर बगैर किसी लाइसेंस के काम कर रहे हैं, और उनकी कोई नियमित जांच नहीं होती।
मुनाफे की भूख और नागरिकों की सुरक्षा से खिलवाड़
इन ब्रीडिंग सेंटर्स और पेट शाप मालिकों के लिए कुत्तों का व्यापार मुनाफे का जरिया बन चुका है। एक राटवीलर या पिटबुल का पिल्ला 20 हजार से 80 हजार रुपये तक में बेचा जाता है। मगर इन खूंखार नस्लों के व्यवहार, प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती। कई बार इन कुत्तों ने बच्चों और बुजुर्गों पर हमला किया है, लेकिन कोई जवाबदेही तय नहीं होती।
निगरानी तंत्र निष्क्रिय, एसपीसीए तक सीमित कार्रवाई
एनिमल वेल्फेयर बोर्ड के हेड एचके शर्मा के अनुसार, यदि किसी पेट शाप या ब्रीडिंग सेंटर की अवैध गतिविधियों की शिकायत मिलती है, तो सरकार की ओर से गठित सोसाइटी फार प्रिवेंशन आफ क्रुएल्टी टू एनिमल (एसपीसीए) को कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं। लेकिन, अब तक देहरादून में किसी बड़ी जांच या कार्रवाई की जानकारी नहीं है, जिससे पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में है।
खूंखार कुत्तों पर हर माह हजारों का खर्च, इंसान की सुरक्षा हासिए पर
देहरादून: दून में पालतू कुत्तों, खासकर राटवीलर, पिटबुल, डोगो अर्जेंटीनो जैसी खतरनाक नस्लों पर हर महीने हजारों रुपये फूंकने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। मानो शहर में इंसानों से ज़्यादा कुत्तों की अहमियत हो गई हो। पिछले कुछ वर्षों में देहरादून में डाग केयर इंडस्ट्री तेज़ी से पनपी है।
महंगे ब्रीड वाले कुत्तों के लिए प्रोफेशनल ग्रूमिंग सैलून, प्रीमियम डाग फूड शाप, पेट कैफे और डे केयर सेंटर और डाग वाकिंग और ट्रेनिंग सर्विस जैसी सेवाएं तेजी से उभरी हैं। एक पालतू राटवीलर या पिटबुल की मासिक देखभाल, खानपान, टीकाकरण और ग्रूमिंग पर 10 से 15 हजार रुपये तक खर्च किया जा रहा है। ऐसे भी कुत्ते हैं जिनकी कीमत लाखों में है और उनकी देखभाल पर हजारों खर्च होते हैं। कुत्तों की देखरेख के लिए कर्मचारी भी रखे जाते हैं।