देहरादून में मिले 45 लाख साल पुराने जीवाश्म, हिमालय के बारे में हुए बड़े खुलासे;

देहरादून: उत्तराखंड में विज्ञान के क्षेत्र से एक बेहद चौंकाने वाली और महत्वपूर्ण खोज सामने आई है। देहरादून के पास मोहंड क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने 45 से 50 लाख वर्ष पुराने प्लायोसीन काल के मीठे पानी की मछलियों के जीवाश्म खोजे हैं। यह खोज न सिर्फ हिमालयी क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को समझने में मददगार है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि कभी यह इलाका जल से भरा एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र हुआ करता था।

देहरादून के नजदीक मोहंड क्षेत्र, जो सहारनपुर-देहरादून सीमा के शिवालिक इलाके में आता है, इस खोज का केंद्र बना। वैज्ञानिकों ने यहां से करीब 500 किलोग्राम तलछट (सेडीमेंट) इकट्ठा की और उसे प्रयोगशाला में बारीकी से जांचा। इस विस्तृत जांच के दौरान कुल 36 जीवाश्म मिले, जिनमें मछलियों के महत्वपूर्ण अवशेष शामिल हैं।

किसने किया यह महत्वपूर्ण शोध

इस शोध को देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक निंगथौजम प्रेमजीत सिंह के नेतृत्व में अंजाम दिया गया। उनके निर्देशन में वैज्ञानिकों की टीम ने इस क्षेत्र की गहन जांच की और यह ऐतिहासिक खोज संभव हो सकी। यह संस्थान लंबे समय से हिमालयी भूविज्ञान और पर्यावरण पर शोध करता आ रहा है।

ओटोलिथ: मछलियों के ‘कान’ से मिला बड़ा सुराग

इस खोज की सबसे खास बात मछलियों के ओटोलिथ (Otolith) का मिलना है। ओटोलिथ मछलियों के कान के अंदर पाए जाने वाले छोटे कैल्शियम के कण होते हैं, जो उन्हें संतुलन बनाए रखने और सुनने में मदद करते हैं। वैज्ञानिकों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इनके जरिए मछली की प्रजाति, उम्र और उसके रहने के वातावरण के बारे में सटीक जानकारी मिलती है। इस खोज में ओटोलिथ का मिलना इस बात का मजबूत प्रमाण है कि यहां कभी सक्रिय जलजीवन मौजूद था।

इस शोध में वैज्ञानिकों को कई प्रकार की मछलियों के जीवाश्म मिले हैं। इनमें चन्ना (स्नेकहेड) मछली शामिल है, जो आज भी भारत के तालाबों और नदियों में पाई जाती है और एक शीर्ष शिकारी मानी जाती है। इसके अलावा ट्राइकोगैस्टर फासियाटा नाम की रंगीन मछली का जीवाश्म मिला, जो शांत पानी में रहने वाली प्रजाति है और इसका जीवाश्म मिलना बेहद दुर्लभ माना जाता है। इसके साथ ही गोबी परिवार की छोटी मछलियों के अवशेष भी मिले, जो आमतौर पर जल की तलहटी में रहती हैं।

क्या बताती है यह खोज

इस खोज से यह स्पष्ट होता है कि आज का मोहंड-देहरादून क्षेत्र प्लायोसीन काल में एक शांत मीठे पानी की झील, तालाब या दलदली क्षेत्र रहा होगा। उस समय यहां उथला और स्थिर पानी मौजूद था, जिसमें घनी जलीय वनस्पतियां और विविध प्रकार के जलजीव पनपते थे। यह एक पूर्ण विकसित मीठे पानी का पारिस्थितिकी तंत्र था, जो समय के साथ भूगर्भीय बदलावों के कारण समाप्त हो गया।

जलवायु और पर्यावरण के संकेत

वैज्ञानिकों के अनुसार, जिन मछलियों के जीवाश्म यहां मिले हैं, वे आज के समय में मुख्य रूप से उत्तर-पूर्व भारत और दक्षिण एशिया के क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि उस समय इस क्षेत्र की जलवायु आज की तुलना में अलग थी और यहां का पर्यावरण अधिक आर्द्र और जलसमृद्ध रहा होगा। यह खोज प्राचीन जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय बदलावों को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

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