देवभूमि में ‘ओवर टूरिज्म’ का खतरा! बेकाबू भीड़, अराजकता और पर्यावरणीय संकट पर उठे बड़े सवाल

उत्तराखंड में आतंक का पर्याय बनता पर्यटन, मास ओवर टूरिज्म और अराजकता पर उठे गंभीर सवाल

देवभूमि की शांति पर बढ़ते पर्यटक दबाव, जंगलों पर संकट, जलस्रोतों के दोहन और कानून व्यवस्था को लेकर नई बहस तेज

नारायण हर गुप्ता, एडवोकेट, नैनीताल हाई कोर्ट

देवभूमि उत्तराखंड, जिसे देश और दुनिया आध्यात्मिक पर्यटन, प्राकृतिक सौंदर्य और हिमालयी संस्कृति के लिए जाना जाता है, आज एक नई चुनौती से जूझता दिखाई दे रहा है। राज्य के अधिकांश प्रमुख पर्यटन स्थलों पर बढ़ती पर्यटकों की संख्या, यातायात अव्यवस्था, पर्यावरणीय दबाव और कुछ स्थानों पर सामने आ रही अनुशासनहीन गतिविधियों ने पर्यटन प्रबंधन पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

वही -मसूरी, नैनीताल, ऋषिकेश, भीमताल, औली, मुक्तेश्वर, चकराता, कौसानी से लेकर बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम तक, लगभग सभी प्रमुख पर्यटन स्थल इन दिनों भारी भीड़ का सामना कर रहे हैं। सप्ताहांत और अवकाश के दौरान हजारों वाहनों की आवाजाही से कई स्थानों पर घंटों लंबा जाम लग जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार अस्पताल, विद्यालय और दैनिक कार्यों तक पहुंचना भी कठिन हो जाता है।

वही -स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि पर्यटन के साथ-साथ कुछ स्थानों पर अनुशासनहीन गतिविधियां भी बढ़ी हैं। सार्वजनिक स्थानों पर शराब सेवन, तेज ध्वनि में संगीत, देर रात तक डीजे, सड़कों पर स्टंट, कूड़ा फैलाना और यातायात नियमों की अनदेखी जैसी घटनाएं स्थानीय वातावरण को प्रभावित कर रही हैं। उनका कहना है कि इससे देवभूमि की सांस्कृतिक गरिमा और शांत वातावरण दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

वही -ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित रिसॉर्ट और पर्यटन प्रतिष्ठानों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि कई स्थानों पर देर रात तक तेज संगीत और पार्टियों के कारण स्थानीय लोगों का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा तथा सामाजिक वातावरण को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है।

वही -पर्यावरणविदों का मानना है कि बढ़ता पर्यटन वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों पर भी दबाव बढ़ा रहा है। हाथियों के पारंपरिक कॉरिडोर, गुलदारों के आवास और संवेदनशील वन क्षेत्रों के आसपास निर्माण गतिविधियों तथा मानवीय हस्तक्षेप में वृद्धि से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में भी बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है।

वही -जलस्रोतों के संरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया है। कई पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक धारे और नौले सूखने की स्थिति में हैं। वहीं स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ क्षेत्रों में प्राकृतिक जलस्रोतों का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है, जबकि आसपास के गांव पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। इस विषय पर प्रभावी निगरानी और नियमन की मांग उठ रही है।

वही -होम स्टे नीति को लेकर भी बहस तेज हो गई है। कई स्थानों पर स्थानीय लोगों का आरोप है कि आवासीय क्षेत्रों में होम स्टे की आड़ में बड़े स्तर पर व्यावसायिक होटल और गेस्ट हाउस संचालित किए जा रहे हैं, जिससे स्थानीय सामाजिक वातावरण प्रभावित हो रहा है। लोगों का कहना है कि नीति की समीक्षा कर स्पष्ट मानक तय किए जाने चाहिए।

वही -विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड के प्रत्येक पर्यटन स्थल की एक सीमित वहन क्षमता है। यदि वैज्ञानिक आधार पर पर्यटकों और वाहनों की संख्या का प्रबंधन नहीं किया गया तो भविष्य में पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियां और गंभीर हो सकती हैं।

वही -सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने राज्य सरकार से मांग की है कि प्रमुख पर्यटन स्थलों की कैरिंग कैपेसिटी निर्धारित की जाए, पर्यटकों और वाहनों की संख्या का वैज्ञानिक प्रबंधन हो, होम स्टे नीति की समीक्षा की जाए, प्राकृतिक जलस्रोतों के व्यावसायिक उपयोग पर कड़ी निगरानी रखी जाए तथा सार्वजनिक स्थानों पर शराब पीकर उपद्रव, ध्वनि प्रदूषण और कानून व्यवस्था भंग करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

वही -उत्तराखंड सदैव पर्यटकों का स्वागत करता रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यटन तभी तक राज्य की ताकत है, जब तक वह प्रकृति, संस्कृति, आस्था और कानून का सम्मान करते हुए संचालित हो। उनका मानना है कि यदि समय रहते संतुलित और वैज्ञानिक पर्यटन नीति लागू नहीं की गई, तो देवभूमि की मूल पहचान और पर्यावरण दोनों पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है।

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