रुड़की: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की (IIT Roorkee) के शोधार्थियों द्वारा किए गए एक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित अध्ययन में उत्तराखंड के लिए गंभीर चेतावनी सामने आई है। अध्ययन के मुताबिक राज्य के लगभग 85 प्रतिशत जिलों में बाढ़ का खतरा बना हुआ है।
शोधकर्ताओं ने भारतीय हिमालयी क्षेत्र में बाढ़ प्रभावित होने वाले इलाकों की पहचान के लिए एडवांस्ड एआई तकनीक का इस्तेमाल किया है। यह अध्ययन भविष्य में आपदा प्रबंधन और समय रहते चेतावनी देने में बेहद अहम साबित हो सकता है। आईआईटी रुड़की के जल संसाधन विकास एवं प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर मोहित पी मोहंती ने बताया कि हिमालयी क्षेत्रों में अचानक आने वाली बाढ़ की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। ऐसे में पारंपरिक बाढ़ पूर्वानुमान मॉडल पहाड़ी इलाकों में डेटा की कमी और कठिन भूभाग के कारण कई बार सटीक परिणाम नहीं दे पाते। उन्होंने कहा कि एआई आधारित यह तकनीक कम समय में जोखिम वाले इलाकों के विस्तृत नक्शे तैयार कर सकती है। इससे प्रशासन को पहले से अलर्ट जारी करने और आपदा की तैयारी करने में मदद मिलेगी। अध्ययन में जिन इलाकों को अधिक जोखिम वाला बताया गया, वे काफी हद तक उन्हीं स्थानों से मेल खाते हैं जहां मानसून के दौरान पहले भी बाढ़ आ चुकी है। इनमें उत्तराखंड का रुद्रप्रयाग जिला और कई प्रमुख सड़क मार्ग शामिल हैं।
प्रोफेसर मोहित पी मोहंती ने बताया कि इस रिसर्च पेपर के प्रथम लेखक शोधार्थी रचित हैं, जबकि वैभव त्रिपाठी सह-लेखक हैं। इसके अलावा प्रोफेसर आशीष पांडे और प्रोफेसर अनिल कुमार गुप्ता भी इस अध्ययन से जुड़े रहे। शोध में यह दावा किया गया है कि एआई आधारित बाढ़ संवेदनशीलता मैपिंग के जरिए लगभग रीयल-टाइम जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इससे सरकार और प्रशासन को समय रहते जरूरी कदम उठाने में मदद मिलेगी, जिससे लोगों की जान-माल और बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकेगा।
CNN U-Net मॉडल से तैयार किया गया बाढ़ जोखिम नक्शा
शोधकर्ताओं ने 90 मीटर के हाई रिजॉल्यूशन स्तर पर बाढ़ की आशंका का विश्लेषण करने के लिए डीप लर्निंग मॉडल CNN U-Net का इस्तेमाल किया। इस मॉडल में बाढ़ के जोखिम का आकलन करने के लिए 14 प्रमुख कारकों को शामिल किया गया। इन कारकों में ऊंचाई, ढलान, वनस्पति आवरण, पानी के बहाव की दिशा और स्थलाकृतिक आर्द्रता जैसे महत्वपूर्ण तत्व शामिल थे।
वनस्पति और ऊंचाई बने सबसे बड़े जोखिम कारक
अध्ययन में सामने आया कि जिन इलाकों में वनस्पति कम है और पानी जमा होने की संभावना अधिक रहती है, वहां बाढ़ का खतरा सबसे ज्यादा है। शोध के मुताबिक वनस्पति आवरण, स्थलाकृतिक आर्द्रता सूचकांक और ऊंचाई इस पूरे क्षेत्र में बाढ़ जोखिम के सबसे अहम कारक हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अध्ययन के नतीजे भविष्य में सड़क, पुल और अन्य बुनियादी ढांचे की योजना बनाने में बेहद उपयोगी साबित होंगे। साथ ही जमीन उपयोग नीति तय करने और आपदा प्रबंधन प्रणाली को मजबूत बनाने में भी यह रिसर्च अहम भूमिका निभाएगी।








