देहरादून: कारगिल युद्ध ने देश को कई अमर वीर दिए, लेकिन उनकी शहादत के साथ उनकी कहानी खत्म नहीं हुई। उत्तराखंड के कई शहीद सैनिकों के परिवारों में आज भी देशसेवा की वही लौ जल रही है। जिन बच्चों ने अपने पिता को खो दिया, उन्होंने बड़े होकर उसी भारतीय सेना की वर्दी को अपनाया, जिसे पहनकर उनके पिता मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। यह केवल पारिवारिक परंपरा नहीं, बल्कि शहादत से जन्मा वह संकल्प है, जिसने नई पीढ़ी को भी राष्ट्रसेवा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया।
टिहरी गढ़वाल के डांडा बड़ीयारगढ़ गांव के राइफलमैन बिक्रम सिंह 29 जून 1999 को कारगिल युद्ध में देश के लिए शहीद हो गए थे। उस समय उनकी पत्नी बीरा देवी गर्भवती थीं। कुछ समय बाद जन्मे बेटे वीर रावत ने अपने पिता को कभी देखा नहीं, लेकिन बचपन से उनकी बहादुरी की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए। मां की आंखों में पिता के लिए गर्व और गांववालों की जुबान पर उनकी वीरता ने वीर रावत के मन में भी सेना में जाने का सपना जगा दिया। आज वीर रावत भारतीय सेना की 9 गढ़वाल राइफल्स में तैनात हैं और अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
मां ने परिवार संभाला, बेटे ने संभाली देश की सीमा
कारगिल युद्ध में 30 मई 1999 को शहीद हुए लांस नायक हीरा सिंह का परिवार भी अदम्य साहस की मिसाल है। पति के बलिदान के बाद पत्नी गंगी देवी ने तीन बेटों का पालन-पोषण कठिन परिस्थितियों में किया।








