उत्तराखंड में भयानक आपदा का खतरा, सरस्वती और केदार ताल का वैज्ञानिक कर रहे अध्ययन.. टीमें रवाना

देहरादून: उत्तराखंड की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों को लेकर सरकार ने वैज्ञानिक अध्ययन तेज कर दिया है। इसी अभियान के तहत चमोली जिले में स्थित सरस्वती ताल और उत्तरकाशी के केदार ताल का विस्तृत बाथीमेट्री सर्वेक्षण किया जाएगा। विशेषज्ञ दल दोनों झीलों की गहराई, जलस्तर, संरचना और अन्य भौगोलिक परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन करेगा। इसके आधार पर इन झीलों से जुड़े संभावित जोखिमों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों के क्रम में प्रदेश की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कराया जा रहा है। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) मुख्यालय से सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने विशेषज्ञ दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।

सर्वेक्षण दल में इन आठ संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल

उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA)
उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (ULMMC)
बाबा साहेब पुराविज्ञान संस्थान, लखनऊ
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान
राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की
SDRF
NDRF
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान

5700 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है सरस्वती ताल

सचिव विनोद कुमार सुमन के अनुसार, सरस्वती ताल करीब 5700 मीटर और केदार ताल करीब 4750 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। इतनी अधिक ऊंचाई और बेहद दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में होने वाला यह वैज्ञानिक सर्वेक्षण चुनौतीपूर्ण है। इसके बावजूद संभावित आपदा जोखिमों की पहचान और जोखिम न्यूनीकरण की दृष्टि से इसे बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

झीलों के जलस्तर और आकार में बदलाव पर रहेगी नजर

सर्वेक्षण के दौरान ग्लेशियर झीलों के जलस्तर, आकार में होने वाले बदलाव, आसपास के भू-भाग और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा।

विशेषज्ञ यह भी अध्ययन करेंगे कि झीलों में होने वाले किसी बड़े बदलाव की स्थिति में उसका प्रभाव नीचे की ओर स्थित क्षेत्रों पर किस तरह पड़ सकता है। इस तरह के वैज्ञानिक आंकड़े संभावित आपदा की स्थिति में समय रहते तैयारी करने और जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में मदद करेंगे।

आधुनिक उपकरणों से होगी निगरानी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि संभावित खतरे की स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों तक समय पर चेतावनी पहुंचाना बेहद महत्वपूर्ण है। इसके लिए ग्लेशियर झीलों की निगरानी में आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण और संचार प्रणाली जैसे तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। सरकार का उद्देश्य वैज्ञानिक अध्ययन के आधार पर संभावित जोखिमों की पहले से पहचान करना और आपदा की स्थिति में त्वरित चेतावनी एवं प्रतिक्रिया की व्यवस्था को मजबूत करना है।

वैज्ञानिक सर्वेक्षण से तैयार होगी जोखिम की तस्वीर

सरस्वती ताल और केदार ताल का बाथीमेट्री सर्वेक्षण इन दोनों ग्लेशियर झीलों की मौजूदा स्थिति को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर झीलों की संरचना, जलस्तर और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों का बेहतर आकलन किया जा सकेगा। इससे भविष्य में ग्लेशियर झीलों से जुड़े आपदा प्रबंधन और जोखिम न्यूनीकरण की योजनाओं को और प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने क्या कहा?

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि प्रदेश की संवेदनशील ग्लेशियर झीलों का व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन कराया जा रहा है। इसके तहत झीलों के जलस्तर, आकार में बदलाव, आसपास के भू-भाग और संभावित जोखिम वाले क्षेत्रों का आकलन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि संभावित खतरे की स्थिति में प्रभावित क्षेत्रों तक समय पर चेतावनी पहुंचाना महत्वपूर्ण है। इसके लिए आधुनिक सेंसर, जलस्तर मापक उपकरण और संचार प्रणाली जैसे तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी।

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